राजगढ़ स्कैंडल: खिलचीपुर नगर परिषद की बैठक में विधायक और पार्षद की तीखी बहस, अध्यक्ष फूट-फूटकर रोईं
राजगढ़ (मध्य प्रदेश): राजनीति के गलियारों में इन दिनों राजगढ़ जिले के खिलचीपुर नगर परिषद की बैठक चर्चा का केंद्र बनी हुई है। मंगलवार को विकास कार्यों की समीक्षा बैठक उस समय हंगामे में बदल गई, जब विधायक हजारीलाल दांगी और पार्षद संदीप शर्मा के बीच तीखी बहस छिड़ गई। स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि नगर परिषद की अध्यक्ष रामजानकी मालाकार सबके सामने भावुक होकर फूट-फूटकर रोने लगीं।

यह घटना न केवल स्थानीय राजनीति का आईना है, बल्कि यह दिखाती है कि राजनीतिक टकराव और व्यक्तिगत रंजिश कैसे जनहित के कामों को प्रभावित कर रहे हैं।
बैठक का एजेंडा: विकास कार्यों की समीक्षा, लेकिन हुआ हंगामा
मंगलवार को नगर परिषद भवन में आयोजित बैठक का उद्देश्य शहर के सात प्रमुख विकास प्रस्तावों की समीक्षा करना था।
बैठक में विधायक हजारीलाल दांगी, अध्यक्ष रामजानकी मालाकार सहित सभी पार्षद मौजूद थे।
शुरुआत में माहौल सामान्य रहा, लेकिन जैसे ही विकास कार्यों की प्रगति और नगर परिषद के कर्मचारियों की जवाबदेही पर सवाल उठे, तनाव बढ़ने लगा।
विधायक बनाम पार्षद: विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
वार्ड-5 के पार्षद संदीप शर्मा ने बैठक में आरोप लगाया कि उनके क्षेत्र में महीनों से कोई विकास कार्य नहीं हुआ।
इस पर विधायक हजारीलाल दांगी भड़क गए और कहा —
“अगर तुम लोग ऐसे काम करोगे, तो कोई काम नहीं होगा।”
इस टिप्पणी से माहौल गरम हो गया।
पार्षद शर्मा ने तीखे लहजे में जवाब दिया —
“साहब, वैसे भी कहाँ काम हो रहे हैं?”
इतना सुनते ही बैठक में मौजूद अन्य पार्षदों ने भी विकास कार्यों की सुस्ती और कर्मचारियों की लापरवाही पर नाराजगी जताई।
विधायक ने तंज कसते हुए पूछा,
“तो कर्मचारी क्या कर रहे हैं?”
इस पर पार्षद संदीप शर्मा ने व्यंग्य किया,
“वह तो सोयाबीन काट रहे हैं।”
इस जवाब से पूरा माहौल ठहाकों और तंज से भर गया, लेकिन स्थिति धीरे-धीरे विवाद और भावनात्मक टकराव में बदल गई।
अध्यक्ष रामजानकी मालाकार के आंसू, बैठक स्थगित
विवाद बढ़ने के साथ नगर परिषद की अध्यक्ष रामजानकी मालाकार भावनात्मक रूप से टूट गईं।
वह गुस्से और दुख से भरकर टेबल पर हाथ पटकते हुए जोर-जोर से रोने लगीं।
मौजूद लोगों के अनुसार उन्होंने कहा —
“मेरे पति की मौत हो गई, और अब आप लोग मेरे ऊपर इस तरह की बातें कर रहे हैं…!”
उनकी इस बात ने माहौल को और गंभीर बना दिया।
वह लगातार रोती रहीं, और अंततः स्थिति संभालने के लिए उपाध्यक्ष ने बैठक को बीच में ही स्थगित कर दिया।
अध्यक्ष के आंसुओं ने इस पूरी घटना को मानवीय और संवेदनशील मोड़ दे दिया, जिसने पूरे शहर में राजनीतिक बहस छेड़ दी।
हंगामे की असली वजह: विकास कार्य या जमीन विवाद?
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, यह झगड़ा केवल विकास कार्यों की देरी तक सीमित नहीं था।
दरअसल, हाल ही में नगर परिषद की कीमती जमीन जनपद पंचायत को देने का प्रस्ताव आया था, जिसका कई पार्षदों ने विरोध किया।
- जनपद को भूमि देने पर नाराजगी:
पार्षदों का कहना है कि नगर परिषद की संपत्ति जनहित में इस्तेमाल होनी चाहिए, न कि अन्य विभागों को दी जाए। - बाउंड्री वॉल विवाद:
जल विभाग की जमीन पर बाउंड्री वॉल निर्माण से पहले सीमांकन (demarcation) को लेकर भी मतभेद हैं।
पार्षदों का आरोप है कि यदि सीमांकन नहीं हुआ तो भू-माफिया इस जमीन पर कब्जा कर सकते हैं। - अध्यक्ष का पारिवारिक जुड़ाव:
चर्चा यह भी है कि इस जमीन से जुड़े मामलों में अध्यक्ष के परिवार का नाम भी सामने आया है, जिससे राजनीति और व्यक्तिगत संबंधों में टकराव और बढ़ गया है।
जनता का सवाल: राजनीति की जंग में जनता का क्या होगा?
यह विवाद केवल नेताओं की आपसी नोकझोंक नहीं, बल्कि जनता के कामों पर सीधे असर डालने वाला मसला है।
विकास कार्य महीनों से ठप हैं, सफाई व्यवस्था चरमरा गई है और नगर परिषद में भ्रष्टाचार के आरोप आम हो चुके हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है —
“नेता लोग आपस में झगड़ रहे हैं, लेकिन इसका खामियाजा आम जनता भुगत रही है। न सड़कें बन रही हैं, न सफाई हो रही है।”
राजनीतिक विश्लेषण: छोटे शहरों की बड़ी राजनीति
राजगढ़ जैसे छोटे शहरों में स्थानीय राजनीति का स्वरूप अब व्यक्तिगत वर्चस्व की लड़ाई में बदलता जा रहा है।
जनप्रतिनिधियों के बीच आपसी मतभेद और गुटबाजी के चलते विकास कार्यों पर सीधा असर पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तरह का माहौल बना रहा, तो खिलचीपुर जैसे नगरों में जनता का भरोसा स्थानीय निकायों से उठ जाएगा।
निष्कर्ष: विकास के नाम पर विवाद
खिलचीपुर नगर परिषद की यह घटना केवल एक बैठक का हंगामा नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीति की गिरती साख का प्रमाण है।
विधायक और पार्षद के बीच का विवाद बताता है कि संवाद की कमी और व्यक्तिगत अहंकार कैसे जनहित के कामों को रोक सकता है।
अध्यक्ष रामजानकी मालाकार के आंसू इस बात के प्रतीक हैं कि राजनीति में इंसानियत और संवेदनशीलता अब कितनी दुर्लभ हो चुकी है।
अब सवाल यह है —
क्या खिलचीपुर के जनप्रतिनिधि अपने मतभेद भुलाकर विकास के लिए एकजुट हो पाएंगे?
या फिर राजनीति की यह जंग जनता के अधिकारों को यूं ही कुचलती रहेगी?