AIIMS भोपाल में बड़ा विवाद: महिला डॉक्टर ने HOD पर लगाए उत्पीड़न और धमकी के आरोप, जांच तेज

AIIMS भोपाल में बड़ा विवाद: महिला डॉक्टर ने HOD पर लगाए उत्पीड़न और धमकी के आरोप, जांच तेज

 एम्स भोपाल में महिला डॉक्टर ने विभागाध्यक्ष पर उत्पीड़न और धमकी के गंभीर आरोप लगाए। ICC ने जांच शुरू कर दी है, मामला कार्यस्थल पर महिला सुरक्षा को लेकर बहस छेड़ रहा है।

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एम्स भोपाल फिर विवादों में — महिला डॉक्टर ने विभागाध्यक्ष पर गंभीर आरोप लगाए

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS Bhopal) एक बार फिर सुर्खियों में है।
संस्थान की एक महिला असिस्टेंट प्रोफेसर ने अपने ही विभागाध्यक्ष (HOD) पर मानसिक उत्पीड़न और धमकी देने के गंभीर आरोप लगाए हैं।
मामला सामने आते ही एम्स प्रशासन ने आंतरिक शिकायत समिति (ICC) के जरिए जांच शुरू कर दी है।


क्या हैं आरोप? – डॉक्टर ने बताया “लगातार मानसिक दबाव और धमकी”

पीड़िता, जो ट्रॉमा और इमरजेंसी मेडिसिन विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं, ने अपनी लिखित शिकायत में कई गंभीर बातें कही हैं।
उनके अनुसार, विभागाध्यक्ष ने बार-बार उन्हें निशाना बनाया और धमकाने की कोशिश की।

  1. अकेले बुलाकर धमकाना:
    डॉक्टर ने आरोप लगाया कि उन्हें ICU काउंसलिंग रूम में अकेले बुलाकर कहा गया — “आपके अप्रूवल पीरियड पर असर पड़ेगा”
  2. सार्वजनिक अपमान:
    विभागीय बैठकों में उनके साथ बदसलूकी की गई और कहा गया कि “आपकी यहां जरूरत नहीं है।”
  3. मानसिक तनाव:
    लगातार हो रही इस प्रताड़ना से उनका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा कि यह माहौल उनके आत्मसम्मान और करियर दोनों के लिए हानिकारक है।

एम्स प्रशासन की प्रतिक्रिया – जांच शुरू, समिति गठित

मामले की गंभीरता को देखते हुए एम्स भोपाल प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई की है।

  • ICC (Internal Complaints Committee) ने मामले की जांच शुरू कर दी है।
  • कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न निवारण अधिनियम, 2013 (POSH Act) के तहत केस दर्ज किया गया है।
  • एक स्वतंत्र जांच समिति भी गठित की गई है जो पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच करेगी।

एम्स प्रशासन ने कहा है कि संस्थान “शून्य सहनशीलता नीति (Zero Tolerance Policy)” पर काम करता है और किसी भी तरह के उत्पीड़न को बर्दाश्त नहीं करेगा।


विभागाध्यक्ष ने आरोपों को बताया निराधार

वहीं, आरोपित विभागाध्यक्ष ने अपनी सफाई में कहा है कि आरोप पूरी तरह झूठे हैं और यह मामला “प्रशासनिक मतभेद” से जुड़ा है।
उनका कहना है कि —

“विभागीय कामकाज को लेकर कुछ मतभेद जरूर हैं, लेकिन किसी तरह का व्यक्तिगत या मानसिक उत्पीड़न नहीं किया गया।”

हालांकि, फिलहाल ICC समिति ने दोनों पक्षों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।


इस विवाद के संभावित प्रभाव

यह मामला न सिर्फ एम्स भोपाल बल्कि पूरे मेडिकल समुदाय में चिंता का विषय बन गया है।
इसके कई गहरे प्रभाव हो सकते हैं:

  1. करियर पर असर:
    पीड़िता ने कहा है कि अगर माहौल सुरक्षित नहीं बना, तो वह नौकरी छोड़ने पर मजबूर हो सकती हैं।
  2. संस्थान की छवि:
    एम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में ऐसे विवादों से उसकी विश्वसनीयता और प्रोफेशनल संस्कृति पर सवाल उठ सकते हैं।
  3. महिला सुरक्षा पर बहस:
    यह मामला फिर एक बार कार्यस्थल पर महिला सुरक्षा और POSH Act के प्रभावी लागू होने पर नई बहस छेड़ रहा है।

कानूनी और सामाजिक नजरिया

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस मामले में POSH Act, 2013 के तहत जांच पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए।
अगर विभागाध्यक्ष दोषी पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई से लेकर निलंबन तक का प्रावधान है।

महिला अधिकार कार्यकर्ता कार्यस्थल पर मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न को भी गंभीर अपराध मानने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि —

“ऐसे मामलों में महिलाएं अकसर चुप रह जाती हैं, जिससे संस्थागत उत्पीड़न को बढ़ावा मिलता है।”


सामाजिक मीडिया पर प्रतिक्रिया

यह मामला सामने आने के बाद #AIIMSBhopal और #DoctorSafety जैसे हैशटैग ट्विटर (X) और इंस्टाग्राम पर ट्रेंड कर रहे हैं।
लोग एम्स प्रशासन से पारदर्शी जांच की मांग कर रहे हैं, वहीं कई डॉक्टरों ने भी पीड़िता का समर्थन किया है।


आगे क्या?

अब सबकी नजरें ICC की रिपोर्ट पर हैं।
जांच पूरी होने के बाद एम्स निदेशक को अंतिम कार्रवाई करनी होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह केस भविष्य में मेडिकल संस्थानों में महिलाओं की सुरक्षा नीति को और मजबूत करने की दिशा तय करेगा।


निष्कर्ष: महिला सुरक्षा पर फिर खड़ा हुआ बड़ा सवाल

एम्स भोपाल का यह मामला एक बार फिर साबित करता है कि कार्यस्थल पर महिला सुरक्षा अब भी एक चुनौती है —
चाहे वह सरकारी दफ्तर हो, कॉर्पोरेट कंपनी या मेडिकल संस्थान।

अगर एम्स जैसी प्रतिष्ठित संस्था भी इस मुद्दे पर सख्ती नहीं दिखाती, तो यह देशभर की महिला कर्मचारियों के लिए गलत संदेश जाएगा।
उम्मीद की जा रही है कि यह मामला केवल न्याय तक सीमित न रहकर, एक संस्थागत सुधार का कारण बनेगा।


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