इंदौर में दहेज न मिलने पर पति ने दी ‘तीन तलाक’, हलाला कराकर पत्नी को किया घर से बाहर – मामला खजराना थाना दर्ज

इंदौर।
शहर के खजराना इलाके में एक महिला ने अपने पति व सास के खिलाफ ऐसी घटनाएं उजागर की हैं, जो घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना, ‘तीन तलाक’ और ‘हलाला’ जैसी विवादित इस्लामी प्रथाओं से जुड़ी हैं। पीड़िता ने आरोप लगाया है कि शादी के बाद से ही दहेज के नाम पर निरंतर प्रताड़ना हुई, फिर अक्टूबर 2024 में भूमिका में ‘तीन तलाक’ लेने के बाद पत्नी को घर से निकाल दिया गया, और जब वापस आने की चाह जताई तो पति ने एक रिश्तेदार से हलाला कराने की शर्त रखी। खजराना पुलिस ने इस शिकायत के आधार पर पति और सास के खिलाफ मामले दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
घटना का पूरा विवरण
29 वर्षीया फरहाना खान ने बताया कि उनकी शादी वर्ष 2010 में वसीम पठान से हुई थी। शादी के तुरंत बाद से ही पति व उनकी माता गुड्डो बी ने दहेज की मांगें शुरू कर दी थीं। आरोप है कि तीन बच्चे होने के बाद भी खर्चे और घर-परिवार के साथ जुड़ी जिम्मेदारियों को लेकर दहेज की मांगें बढ़ती रहीं।
अक्टूबर 2024 में, जब दहेज पूरा नहीं हुआ तो वसीम ने फरहाना को तीन बार ‘तलाक’ कहकर घर से निकाल दिया। इसके बाद जब पत्नी ने वापस लौटने की गुहार लगाई, तो पति ने शर्त रखी कि वह इस्लामी रीति-रिवाज के अनुसार अन्य पुरुष से विवाह करे और तलाक के बाद वापसी करे (हलाला) — इस तरह हलाला की प्रक्रिया हुई। आरोपी ने रिश्तेदार सईद के साथ 500 रुपए के स्टाम्प पेपर पर हलाला कराई।
इसके बावजूद, वसीम ने पत्नी को वापस नहीं लिया और दो बच्चों को अपने पास रख लिया, जबकि एक बेटा फरहाना के पास रहा। लंबे समय तक चलती प्रताड़ना, वादाखिलाफी व शर्तों से तंग आकर फरहाना सोमवार को खजराना थाने पहुंची और शिकायत दर्ज कराई।
कानूनी पहलू और प्रासंगिक कानून
इस मामले में तीनतलाक और हलाला दोनों ही शामिल हैं। भारत में The Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019 ने ’इंस्टेंट तीन तलाक’ (तलाक-ए-बिद्दत) को अवैध व निराधार घोषित किया है। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2017 में इसे संवैधानिक रूप से अमान्य माना था।
इस कानून के अंतर्गत, पति द्वारा तीन-तलाक का प्रावधान अपराध-प्राय मामला बन गया है, जिसमें पत्नी को बच्चों की देखभाल तथा भरण-पोषण का हक प्राप्त है, और दोषी पति पर तीन वर्ष तक की सजा व जुर्माना हो सकता है।
सामाजिक-मानवाधिकार दृष्टि से विश्लेषण
इस प्रकार की घटना हमें यह दिखाती है कि दहेज-मांग, तीन तलाक, और हलाला जैसी प्रथाएँ न सिर्फ व्यक्तिगत परिवारों में शोषण का माध्यम बन रही हैं, बल्कि महिलाओं की गरिमा और संविधान में उन्हें मिले न्याय के अधिकारों का उल्लंघन करती हैं। महिलाओं की निजी आज़ादी, बराबरी, और घरेलू सुरक्षा का सवाल उठता है।
विशेष रूप से, तीन तलाक की प्रथा ने महिलाओं को अचानक और बिना सहमति के विवाह बांड से बाहर निकालने की छूट दी थी — जिसे अदालतों ने ‘मानवाधिकार व समानता के खिलाफ’ माना है।
इस मामले के मायने
- यह मामला दहेज-प्रथाओं और लंबे समय तक चली प्रताड़ना की गंभीरता को उजागर करता है।
- तीन-तलाक व हलाला की प्रथाओं से न सिर्फ व्यक्तिगत जीवन प्रभावित हुआ है बल्कि यह महिलाओं की स्वतंत्रता व सामाजिक सुरक्षा पर प्रतिकूल असर डालती हैं।
- खजराना थाने में मामला दर्ज हो चुका है — अब जाँच व कानूनी प्रक्रिया आगे होगी; यह अन्य प्रदेशों में ऐसे मामलों के प्रति चेतावनी का संकेत भी है।
- मीडिया व सामाजिक-संगठन इस तरह की घटनाओं को उजागर कर सकती हैं ताकि महिलाओं को सजग किया जा सके और सामाजिक जागरूकता बढ़े।
पाठकों के लिए सुझाव
अगर आप या आपका परिचित इस तरह की समस्या से जूझ रहा है:
- थाने में तुरंत शिकायत दर्ज कराएं; तीन-तलाक की घटना पर क़ानून सक्रिय है।
- दहेज-प्रताड़ना व घरेलू हिंसा के मामलों में Bharatiya Muslim Mahila Andolan जैसे महिला-संगठनों से संपर्क संभव है। (Wikipedia)
- कानूनी सलाह अनिवार्य है — आप वकील से परामर्श कर सकते हैं कि कौन-से अधिकार आपके पास हैं और कैसे आगे बढ़ा जाए।
- सामाजिक रूप से भी हमें इन प्रथाओं के खिलाफ आवाज उठानी होगी — सहायक बनें, जागरूक हों और अन्याय के खिलाफ खड़े हों।