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छिंदवाड़ा: पारिवारिक विवाद के बीच माँ ने दो बेटों समेत कीटनाशक पीकर आत्महत्या का प्रयास — पति की सतर्कता से बची जान

छिंदवाड़ा: पारिवारिक विवाद के बीच माँ ने दो बेटों समेत कीटनाशक पीकर आत्महत्या का प्रयास — पति की सतर्कता से बची जान

छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश – मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के बांसखेड़ा गांव में एक दुखद और चिंताजनक मामला सामने आया है। यहाँ एक महिला ने पारिवारिक तनाव से तंग आकर अपने दो छोटे बेटों के साथ कीटनाशक पीकर आत्महत्या का प्रयास किया। यदि समय पर हस्तक्षेप नहीं हुआ होता, तो तीनों की जान भी जा सकती थी। इस घटना ने ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक कलह और आत्महत्या प्रयास की समस्या की गंभीरता को उजागर कर दिया है।

छिंदवाड़ा: पारिवारिक विवाद
छिंदवाड़ा: पारिवारिक विवाद

घटना का पूरा विवरण

मंगलवार की शाम को बांसखेड़ा गांव निवासी बेबी धुर्वे (32 वर्ष) ने खेत में रखे तरल कीटनाशक का सेवन किया। इसके बाद उन्होंने अपने बेटे प्रतीक धुर्वे (6 वर्ष) तथा छोटे बेटे हर्षित धुर्वे (3 वर्ष) को भी वहीं कीटनाशक पिलाया। उनकी स्थिति अचानक बिगड़ने लगी, उल्टियाँ होने लगीं और सांस में कमी महसूस होने लगी।

उनके पति संतोष धुर्वे ने बताया कि पत्नी लंबे समय से अपनी सास से चल रहे विवाद से परेशान थीं। “मैं खेत से लौट रहा था जब मुझे पता चला कि उनके साथ कुछ गड़बड़ है। मुझे तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा,” उन्होंने कहा।


चिकित्सा हस्तक्षेप ने बचाई जान

संतोष ने तुरंत तीनों – पत्नी व दोनों बेटों – को जिला अस्पताल छिंदवाड़ा ले जाया। प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टरों ने उनकी स्थिति स्थिर बताई है। व्यस्था के कारण कीटनाशक के असर को कम करने के लिए समय-से-समय पर देखभाल जारी है।
डॉक्टरों की राय में, ग्रामीण इलाकों में इस तरह के आत्महत्या के प्रयासों के बाद उचित मनोवैज्ञानिक परामर्श और पुनर्वास बेहद जरूरी है, वरना दीर्घकालिक मानसिक व शारीरिक असर हो सकते हैं।


पुलिस ने मामला दर्ज किया और जाँच शुरू

बांसखेड़ा थाना पुलिस ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए आत्महत्या के प्रयास की प्रायः घटना के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस सूत्रों का कहना है कि वे निम्न-पहलुओं की जाँच कर रहे हैं:

थाना प्रभारी ने बताया कि प्राथमिक चिकित्सा व बचाव को प्राथमिकता दी गई है, उसके बाद आगे जाँच व कानूनी कार्रवाई की जाएगी।


ग्रामीण जीवन में बढ़ती चुनौतियाँ

यह घटना इस बात का संकेत है कि ग्रामीण इलाकों में मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक कलह और समर्थन की कमी कितनी बड़ी समस्या बन चुकी है। शोधों के अनुसार, मध्य प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य संवेदनशीलता बहुत कम है। (PMC)
कट्टर सामाजिक दबाव, अकेलापन, पारिवारिक संघर्ष व साहाय्य-सेवा की कमी ऐसे मामलों को बढ़ावा देने वाले कारण बन सकते हैं।


सामाजिक प्रतिक्रिया व आगे का दृष्टिकोण

स्थानीय समाजसेवी व निवासी ने इस घटना पर चिंता व्यक्त की है। “यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज में चल रही अव्यवस्था का संकेत है,” एक समाजसेवी ने कहा। उन्होंने सुझाव दिया है कि गाँव-स्तर पर मनोवैज्ञानिक सलाह-केंद्र, मुक्त सक्रियता सहयोग समूह और स्त्री-सशक्तिकरण कार्यक्रम चलाना चाहिए।

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के आत्महत्या-प्रयास में समय-पर हस्तक्षेप बहुत अहम है। जब व्यक्ति खुद को अकेला महसूस करता है, संवाद नहीं हो पाता, तब वह गलत निर्णय की ओर जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यही एक बड़ी समस्या है — समय पर मदद नहीं मिलना। (PMC)


प्रशासन और स्वास्थ्य प्रणाली की भूमिका

जिला प्रशासन ने इस घटना के बाद स्वास्थ्य व सामाजिक न्याय विभाग को निर्देश दिए हैं कि ऐसे परिवारों से संवाद स्थापित किया जाए और उन्हें चिकित्सा-सहायता व परामर्श सेवा मुहैया कराई जाए। वहीं जिला अस्पताल ने भी प्रयास शुरू किया है कि ऐसे मामलों में प्राथमिक चिकित्सा के साथ मनो-स्वास्थ्य स्क्रीनिंग की जाए।

राष्ट्रिय स्वास्थ्य कार्यक्रमों ने ग्रामीण मनो-स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में समाहित करने की दिशा में पहल की है। (Ministry of Health and Family Welfare) लेकिन अभी भी ग्रामीण इलाकों में यह सेवा पर्याप्त रूप से पहुँच नहीं पाई है।


क्या सबक मिलते हैं?

इस घटना से हम निम्न-बिंदुओं को सबक के रूप में ले सकते हैं:

  1. परिवारिक संवाद आवश्यक है — कलह या तनाव को सुलझाने के लिए खुला संवाद जरूरी है।
  2. मनो-स्वास्थ्य की समझ बढ़नी चाहिए — यह सिर्फ ‘मुझसे नहीं होता’ नहीं बल्कि जीवन-गुण व सुरक्षा का हिस्सा है।
  3. तत्काल मदद मायने रखती है — जैसे पति ने किया, समय पर हस्तक्षेप बचाव बन गया।
  4. गाँव-स्तर पर सहायता तंत्र मजबूत होना चाहिए — मानसिक स्वास्थ्य व सामाजिक समर्थन प्रणालियाँ जरूरी हैं।

निष्कर्ष

बांसखेड़ा गाँव की यह घटना सिर्फ एक पारिवारिक विवाद या आत्महत्या-प्रयास नहीं है। यह ग्रामीण भारत में मौजूद सामाजिक, मानसिक व स्वास्थ्य-संशयित चुनौतियों का आईना है। जहाँ एक तरफ पति की तेजी ने जीवन बचाया, वहीं यह दर्शाता है कि अगर संवाद व सहायता मौजूद नहीं होती, तो परिणाम जनहित के विरुद्ध हो सकते हैं।

हम आशा करते हैं कि प्रशासन, स्वास्थ्य प्रणाली व समाज मिलकर ऐसे मामलों को रोकने की ओर सक्रिय कदम उठाएँगे, ताकि कभी-कभी ‘नॉर्मल’ दिखने वाली जिंदगी के पीछे छुपे दर्द को समय रहते सुलझाया जा सके।


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