MP High Court ने पदोन्नति आरक्षण नीति पर उठाए सवाल — “समानता का अधिकार कहाँ गया?

MP High Court ने पदोन्नति आरक्षण नीति पर उठाए सवाल — “समानता का अधिकार कहाँ गया?

भोपाल | Madhya Pradesh Update (2025):
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की नई पदोन्नति में आरक्षण नीति (Promotion Quota Policy) पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर सरकारी विभागों में अधिकांश उच्च पद पहले से ही आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों के पास हैं, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन हो सकता है।

MP High Court ने पदोन्नति आरक्षण नीति पर उठाए सवाल — “समानता का अधिकार कहाँ गया?
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📊 क्या कहा कोर्ट ने?

जस्टिस विवेक अग्रवाल की खंडपीठ ने बुधवार को हुई सुनवाई में सरकार द्वारा पेश की गई रिपोर्ट को “अधूरी और अस्पष्ट” बताया।
रिपोर्ट में कई विभागों के आंकड़े दिए गए थे, जिनमें यह दिखाया गया कि उच्च पदों पर आरक्षित वर्ग के अधिकारियों की संख्या काफी अधिक है।

कोर्ट ने टिप्पणी की —

“अगर सभी पद एक ही वर्ग को मिल रहे हैं, तो फिर समान अवसर और योग्यता का सिद्धांत कहाँ रह जाएगा?”


🏛️ सरकार की रिपोर्ट पर कोर्ट की नाराज़गी

राज्य सरकार ने अदालत में एक सीलबंद लिफाफे में विभागवार पदोन्नति से जुड़े आँकड़े सौंपे थे।
कोर्ट ने पाया कि रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि किस आधार पर आरक्षण जारी रखा गया है —
क्या यह सामाजिक और प्रशासनिक पिछड़ेपन के अध्ययन पर आधारित है या सिर्फ पुराने डेटा पर?

इस पर कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई में स्पष्ट, ताज़ा और प्रमाणिक आँकड़े पेश करे, जिससे यह साबित हो सके कि नीति संवैधानिक और तार्किक है।


⚔️ विवाद की जड़ क्या है?

यह विवाद “मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम 2025” (MP Public Service Promotion Rules 2025) को लेकर है।
सरकार ने इन नियमों के ज़रिए फिर से आरक्षण आधारित पदोन्नति प्रणाली लागू की है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि —

  • सुप्रीम कोर्ट ने 2006 और 2016 में इस तरह के पुराने नियमों को रद्द कर दिया था।
  • सरकार ने उन्हीं नियमों को नए नाम से दोबारा लागू कर दिया है।

वहीं सरकार का पक्ष है कि नए नियम संवैधानिक दिशा-निर्देशों के अनुरूप हैं और इससे सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिलेगा।


👩‍💼 कौन प्रभावित होगा?

इस नीति का असर राज्य के हजारों सरकारी कर्मचारियों पर पड़ने वाला है —

  • आरक्षित वर्ग (SC/ST/OBC) के कर्मचारी चाहते हैं कि उन्हें प्रमोशन में आरक्षण जारी रहे।
  • जबकि सामान्य वर्ग (General Category) के कर्मचारी इसे “अन्यायपूर्ण” बता रहे हैं और Merit-Based Promotion System की मांग कर रहे हैं।

कई कर्मचारी संगठनों का कहना है कि इस नीति से प्रशासनिक कार्यकुशलता (Administrative Efficiency) पर भी असर पड़ सकता है।


📅 आगे क्या होगा?

अदालत ने अगली सुनवाई 12 नवंबर 2025 को तय की है।
इससे पहले, सरकार को कोर्ट में एक अपडेटेड डेटा रिपोर्ट देनी होगी, जिसमें यह स्पष्ट हो कि:

  1. किस आधार पर आरक्षण की गणना की गई,
  2. किन विभागों में इसका संतुलन बिगड़ा है,
  3. और क्या यह नीति कानूनी रूप से टिकाऊ (Legally Sustainable) है।

🧠 कानूनी पृष्ठभूमि: सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन

सुप्रीम कोर्ट ने अपने M. Nagaraj Case (2006) और Jarnail Singh Case (2018) में साफ कहा था —

“पदोन्नति में आरक्षण तभी वैध होगा, जब सरकार यह साबित करे कि आरक्षित वर्ग अब भी सामाजिक और प्रशासनिक रूप से पिछड़ा है।”

इसके लिए सरकार को हर बार विस्तृत डेटा एनालिसिस और रिव्यू रिपोर्ट पेश करनी होती है।
MP सरकार की मौजूदा रिपोर्ट इसी कसौटी पर कमज़ोर पाई गई है।


📰 संक्षेप में:

MP हाईकोर्ट का यह रुख राज्य की Reservation Policy 2025 के भविष्य के लिए बेहद अहम है।
अगर कोर्ट ने इसे असंवैधानिक माना, तो राज्य सरकार को अपनी नीति फिर से बनानी पड़ सकती है।
यह मामला न सिर्फ मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे देश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण बनाम समानता (Reservation vs Equality) की बहस को नई दिशा दे सकता है।


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