मध्य प्रदेश में प्री-पेड स्मार्ट मीटर की शुरुआत: मंत्रियों और सरकारी कार्यालयों पर भी अग्रिम बिजली भुगतान अनिवार्य

मध्य प्रदेश में ‘प्री-पेड स्मार्ट मीटर’ की शुरुआत: मंत्रियों और सरकारी कार्यालयों पर भी अग्रिम बिजली भुगतान अनिवार्य

 


भोपाल (मध्य प्रदेश)

मध्य प्रदेश सरकार ने बिजली वितरण में पारदर्शिता और वित्त-अनुशासन बढ़ाने हेतु एक बड़ा कदम उठाया है। अब प्रदेश के मंत्रियों के बंगले से लेकर हर एक सरकारी कार्यालय तक प्री-पेड स्मार्ट मीटर लगाना अनिवार्य होगा। इसके तहत बिजली आपूर्ति के लिए अग्रिम भुगतान करना होगा — ठीक उसी तरह जैसे मोबाइल फोन में उपयोग से पहले रिचार्ज किया जाता है। यह कदम राज्य के विद्युत विभागों पर बढ़ते बिल-बकाए और घाटे को नियंत्रित करने की दिशा में है।

मध्य प्रदेश में ‘प्री-पेड स्मार्ट मीटर’ की शुरुआत: मंत्रियों और सरकारी कार्यालयों पर भी अग्रिम बिजली भुगतान अनिवार्य
मध्य प्रदेश में ‘प्री-पेड स्मार्ट मीटर’ की शुरुआत: मंत्रियों और सरकारी कार्यालयों पर भी अग्रिम बिजली भुगतान अनिवार्य

 


नई व्यवस्था क्या कहती है?

  • अब मंत्रालयों, सरकारी विभागों एवं मंत्रियों के आवासों में लगने वाले मीटर “रिचार्ज मॉडल” पर काम करेंगे: अर्थव्यवस्था के अनुरूप प्री-पेड स्मार्ट मीटर की स्थापना होगी और यदि रिचार्ज राशि समाप्त हो जाती है, तो बिजली आपूर्ति स्वतः बंद हो जाएगी।
  • यह निर्णय केंद्र सरकार की Revamped Distribution Sector Scheme (RDSS) के अंतर्गत आता है, जो प्री-पेड मीटरिंग, स्मार्ट ग्रिड एवं वितरण नेटवर्क में सुधार को बढ़ावा देता है।राज्य में अनुमानित 55 लाख प्री-पेड स्मार्ट मीटर लगाने का लक्ष्य है, मीटरिंग-प्रणाली में निवेश लगभग ₹15,000 करोड़ के आसपास बताया जा रहा है।

क्यों लिया गया यह कदम?

इस पहल के पीछे मुख्य कारणों में शामिल हैं:

  • सरकारी विभागों पर जमा भारी बिजली बिल बकाया — आंकड़ों के अनुसार, सिर्फ कुछ विभागों पर ही सौ करोड़ों का बकाया जमा है।
  • वितरण कंपनियों (DISCOMs) की वित्तीय स्थिति सुधारने की जरूरत — मीटरिंग, बिलिंग व संग्रह (collection) में सुधार से घाटे में कमी संभव है।
  • स्मार्ट मीटरिंग से बिजली चोरी, अनियंत्रित खपत और तकनीकी व वाणिज्यिक (AT&C) नुकसानों को कम करने में मदद मिलेगी।
  • अग्रिम भुगतान मॉडल अपनाने से सरकार को समय पर भुगतान मिलने तथा नकदी प्रवाह (cash flow) बेहतर होगा।

इसके लाभ और चुनौतियाँ

लाभ:

  • वित्त-अनुशासन में बढ़ोतरी: सरकारी विभागों को अब बिल आने के बाद विलंब करने का विकल्प कम होगा।
  • बकाया बिजली बिलों में कमी: अग्रिम भुगतान से पुराने बकाए और नए बनी देनदारियों (liabilities) पर अंकुश लगेगा।
  • स्मार्ट मीटर से पारदर्शिता एवं नियंत्रण: आपूर्ति-वापसी का रिकॉर्ड बना रहेगा, खपत का डेटा मिलेगा और बिजली वितरण कंपनियों के लिए बेहतर मैनेजमेंट होगा।
  • ऊर्जा संरक्षण व खपत-जागरूकता: जब उपभोक्ता पहले से रिचार्ज करेंगे, तो खपत पर ध्यान देना आसान होगा।

चुनौतियाँ:

  • तकनीकी व प्रशासनिक तैयारी की आवश्यकता — स्मार्ट मीटरिंग, डेटा प्रबंधन, संग्रह प्रणाली को मजबूत करना होगा।
  • विभागों के लिए शुरुआत में खर्च बढ़ सकता है — मीटर की लागत, स्थापना एवं नेटवर्किंग।
  • अग्रिम भुगतान मॉडल में यह जोखिम है कि बजट-कम विभागों या छोटे उपभोक्ताओं को परेशानी हो सकती है। कुछ साहित्य में यह चिंता जताई गई है कि पूर्व-भुगतान मॉडल निम्न-आय वर्ग के लिए चुनौतियां खड़ी कर सकता है।
  • राज्य-स्तर पर मीटरिंग कार्य समान गति से नहीं चल रहा है — कुछ राज्यों में प्रगति धीमी रही है।

यह कदम कहाँ तक प्रभावी रहेगा?

यह पूरी पहल सिर्फ “मंत्रियों व सरकारी कार्यालयों” तक सीमित नहीं है — यह संकेत देती है कि सार्वजनिक क्षेत्र में ऊर्जा वितरण और खपत की प्रक्रिया बदलने की दिशा में काम हो रहा है। जब सबसे पहले सरकारी संस्थानों में स्मार्ट-प्री-पेड मीटर लागू होंगे, तो उनकी सफलता को देखकर बाद में निजी उपभोक्ता व घरेलू क्षेत्रों में विस्तार संभव होगा।

राज्य की इस पहल का मतलब यह भी है कि वितरण कंपनियों को अब केवल बिल जारी करना नहीं, बल्कि स्मार्ट निगरानी व समय-पर भुगतान सुनिश्चित करना होगा। इसके चलते उपभोक्ताओं और सरकारी विभागों को दोनों को व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।


भविष्य की दिशा

  • जैसे-जैसे राज्य प्रशासन और विद्युत निगम स्मार्टर मीटरिंग प्रणालियों को अपनाएंगे, डेटा-आधारित खपत प्रबंधन, टाइम-ऑफ-यूज़ (ToD) टैरिफ, पीक-घंटों में खपत नियंत्रण जैसी सुविधाएँ सामने आएंगी।
  • राज्यों द्वारा स्मार्ट मीटरिंग के परिणाम अच्छे आएँ तो निजी उपभोक्ताओं के लिए भी रिइम्प्लीमेंटेशन (re-implementation) की दिशा खुल सकती है।
  • साथ ही, ऊर्जा संरक्षण व ‘ग्रीन एनर्जी’ प्रवृत्ति (जैसे सौर ऊर्जा) के साथ यह कदम बेहतर समन्वय में काम कर सकता है।
  • नीति-निर्माताओं को यह देखना होगा कि सस्ती विद्युत पहुँच बनी रहे, और यह शुरुआत उपभोक्ताओं पर वित्त-दबाव नहीं बनाए।

निष्कर्ष

मध्य प्रदेश सरकार का यह कदम “सरकारी विभागों में अग्रिम भुगतान + स्मार्ट मीटरिंग” के संयोजन से एक नए प्रयोग की शुरुआत है। यह न केवल बिजली वितरण प्रणाली को आधुनिक बनाएगा बल्कि वित्त-अनुशासन और खपत-जागरूकता लाने का अच्छा अवसर है। यदि यह मॉडल सफल रहा, तो यह पूरे राज्य में और समय के साथ अन्य राज्यों में भी अपनाया जा सकता है।

यह बदलाव सिर्फ तकनीकी अपग्रेड नहीं है बल्कि एक व्यवस्थागत सुधार, जिसमें सरकारी कार्यालयों की खपत जवाबदेही बढ़ेगी — और अंततः इसका असर उन सामान्य नागरिकों व उपभोक्ताओं तक पहुँचेगा जो बिजली-उपयोग के मोर्चे पर हैं।

 

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